Saturday, 17 October 2015

usb

USB (Universal Serial Bus ) कंप्यूटर को दुसरे बाहरी यंत्रो से जोड़ने के लिए सबसे ज्यादा सहायक कनेक्शन है. बाहरी यंत्र जैसेकि डिजिटल कैमरा, प्रिंटर, स्कैनर या फिर अन्य बाहरी हार्ड ड्राइव. इसके इस्तेमाल से आप अपने डाटा को हर सेकंड 12 Mb की गति से  एक जगह से दूसरी जगह भेज सकते हो. 1996 में कुछ कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियो ने USB की शुरुआत की थी और आजकल हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के साथ USB केबल भी आती है ताकि उसको आपके कंप्यूटर के साथ आसानी से जोड़ा जा सके. ये एक पिन की तरह दिखता है. अगर आप इसे कंप्यूटर से जोड़ना चाहते है तो आपको इसे अपने कंप्यूटर के USB पोर्ट से जोड़न होगा, जो आपको अपने कंप्यूटर के CPU के आगे और पीछे मिलते है. USB एक ऐसी टेक्नोलॉजी के हिसाब से बना है जिसमे आप इसे आसानी से कंप्यूटर के साथ जोड़ और हटा सकते हो, इसके लिए आपको बार बार कंप्यूटर को बंद या ऑन नही करना पड़ता.
 
Explain the USB Port Function
Explain the USB Port Function

USB PORT:
आपके कंप्यूटर में USB को लगने के लिए दी गई जगह को USB PORT कहा जाता है. आजकल हर कंप्यूटर USB PORT के साथ आता है ताकि आप इसके जरिये अपने कंप्यूटर के साथ कुछ बाहरी डिवाइस को जोड़ कर उनका इस्तेमाल कर सको. कंप्यूटर ऑपरेटर भी आपके USB को सपोर्ट करता है, और इसी वजह से आपके कंप्यूटर में कोई नही इंस्टालेशन आसानी से और जल्दी हो जाती है. इसके साथ ही आप इसे विंडो 98 या उसके बाद आई किसी भी विंडो में इस्तेमाल कर सकते हो. कंप्यूटर को बाहरी यंत्रो से जोड़ने वाले पुराने तरीके कंप्यूटर के लिए एक तरह से सिर दर्द का काम करते थे लेकिन USB पोर्ट के जरिये कंप्यूटर से जुड़ना बहुत ही आसान होता है.  
USB के 2 version होते है. 
-    USB 1.0 – ये ज्यादातर सिर्फ कीबोर्ड और माउस को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होता है और ये 11 Mbps की गति पर काम करता है. 
-    USB 2.0 – ये USB का नया version है और आप इससे किसी भी बाहरी यंत्र को जोड़ सकते हो जो USB पोर्ट को सपोर्ट करता हो. 480 Mbps की गति से काम करता है. इसीलिए पिछले लगभग तीन सालो से हर कंप्यूटर में इस नए version का ही इस्तेमाल होता है.
 
USB Port Kaise Kaam Karta hai
USB Port Kaise Kaam Karta hai

USB कनेक्टर 3 तरह के आते है
1.       टाइप 1 – ये फ्लैट होते है और ये बाकी कनेक्टर से थोड़े बड़े होते है, इन्ही को कंप्यूटर के साथ फाइल लेने या देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इनके जरिये आप कीबोर्ड, माउस, पैनड्राइव, अपना मोबाइल फ़ोन इत्यादि जोड़ सकते हो.
2.       टाइप 2 – ये चकोरकार के होते है और थोड़े बड़े भी होते है, इस तरह के कनेक्टर ज्यादातर स्कैनर, प्रिंटर या फिर हार्ड ड्राइव्स के पाते है जिनके जरिये ये कंप्यूटर के साथ जुड़ते है.
3.       टाइप 3 – ये भी दिखने में टाइप 2 की ही तरह होते है लेकिन इनका आकार छोटा होता है और इनके जरिये कैमरा, MP3 प्लेयर और बाकी के छोटे डिवाइस को कंप्यूटर से जोड़ा जाता है. 
USB पोर्ट के प्रकार
जब आप कंप्यूटर CPU के पीछे देखोगे तो आप पाओगे के वह कई तरह के पोर्ट दिए गये होते है जो कंप्यूटर के हर हिस्से को जोड़ने में सहायक होते है. वे सब एक दुसरे से अलग अलग होते है. उन्ही में से कुछ ऐसे पोर्ट होते है जिन्हें Universal Serial Bus कहा जाता है. ये मुख्यतः 3 प्रकार के पाए जाते है.
·         Type A – ये USB पोर्ट के वास्तविक रूप के होते है जो फ्लैट और आयताकार के दिखाई देते है इनमे आप उन सब USB कनेक्शन को लगा सकते हो जो ऊपर टाइप 1 में बताये गये है.
·         Type B – ये बड़े और चोकोर होते है जिनमे आप अपने प्रिंटर, स्कैनर इत्यादि के USB कनेक्टर को जोड़ते हो.
Type C इनके द्वारा आप अपने उन डिवाइस के साथ डाटा शेयर कर सकते हो जो आपके मनोरंजन के काम आते है. जैसेकि कैमरा, MP3 प्लेयर इत्यादि. ये दिखने में टाइप बी की ही तरह होते है लेकिन आकर में उनसे छोटे होते है.
 
USB पोर्ट क्या है

माउस ( Mouse ) क्या है?

माउस कंप्यूटर के इनपुट डिवाइस में से एक अहम यंत्र है. एक माउस को Pointing Device  भी कहा जाता है क्योकि ये आपको कंप्यूटर स्क्रीन पर मूव करने, चिन्हित करने, चुनने और क्लिक करने में मदद देता है. माउस में दो बटन होते है – 1.)  Right बटन और 2.) Left  बटन.  इनके साथ ही इसके बीच में एक चक्र भी होता है जो आपको ऊपर और नीचे आने में मदद करता है. माउस में दिए दोनों बटन का कार्य अलग अलग होता है. लेफ्ट बटन आपको किसी भी फाइल को ओपन करने के लिए काम आता है. ये एक तरह से ओके ( ok ) के बटन की तरह होता है. जबकि  राईट बटन आपको उस फाइल से जुड़े अन्य आप्शन देता है.
कंप्यूटर माउस का मुख्य काम आपके हाथो के हावभाव को सिग्नल में बदलना है ताकि उसे कंप्यूटर इस्तेमाल कर सके. इन्हें सिग्नल को पकड़ने के लिए माउस में एक ट्रैक बॉल होती है. तो पहले ये जानते है कि ट्रैक बॉल कैसे काम करती है.
 
माउस के लाभ और हानि
माउस के लाभ और हानि

-    माउस के अंदर एक छोटी से बॉल होती है जिसे ट्रैक बल कहते है. जब ये माउस हिलता है तो ये बॉल भी हिलती है और सिग्नल लेकर कंप्यूटर डेस्कटॉप में उसी तरह माउस पॉइंटर को हिलती है.
-    माउस के अंदर दो रोलर होते है एक वो जो X ( Horizontal ) दिशा के सिग्नल पकड़ कर काम करता है और दूसरा Y ( Vertical ) दिशा के सिग्नल पकड़ कर काम करता है. ये बिलकुल आपके मैथ्स के कार्तेसियन प्लेन ( Cartesian Plane ) की तरह काम करता है.
-    इन दोनों रोलर से एक शाफ़्ट ( shaft ) जुडा होता है और शाफ़्ट एक डिस्क को उसके छेद की मदद से घुमाता है. इसलिये जब भी रोलर घूमते है तब शाफ़्ट घूमता है, साथ ही डिस्क भी घूमना शुरू कर देती है
-    इस डिस्क के एक तरफ LED होती है तो दूसरी तरफ सेंसर. जब भी LED से रोशनी आती है तो डिस्क का छेद उसे तोड़ देता है ताकि सेंसर उस रोशनी की पल्सेस को पढ़ सके. पल्सेस की गति ही माउस की गति को आधार देती है. जितनी ज्यादा पल्सेस होंगी आपके माउस की गति भी उतनी ही ज्यादा होगी.
-    अंत में माउस में लगा एक प्रोसेसर उन सेंसर से उन पल्सेस की जानकारी को लेकर उन्हें कंप्यूटर की भाषा ( Binary Language ) में बदल देता है. जिसे कंप्यूटर आसानी से समझ कर काम करने लगता है. तो इस तरह से आपका माउस आपके हाथो के हावभाव को पढ़ कर कंप्यूटर डेस्कटॉप तक जानकारी को पहुंचता है.
माउस को कंप्यूटर से जोड़े:
USB के आने से किसी भी बाहरी यंत्र ( जैसे प्रिंटर, कीबोर्ड, डिजिटल कैमरा इत्यादि ) को कंप्यूटर से जोड़ना बहुत ही आसान हो गया है इसलिए आजकल तो माउस को कंप्यूटर से जोड़ने के लिए भी USB कनेक्टर का इस्तेमाल होता है. लेकिन पहले माउस को कंप्यूटर से जोड़ने के लिए PS/2 कनेक्टर का इस्तेमाल होता था. इसके अलावा भी कुछ कंप्यूटर में कुछ सीरियल टाइप के कनेक्टर का इस्तेमाल होता था.
माउस के प्रकार :
माउस मुख्यतः 5 प्रकार के होते है, जो निम्नलिखित है.
1.       सामान्य माउस ( केबल के साथ ) : इन माउस का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है. ये वे माउस होते है जो हम सामान्यतः अपने आसपास देखते है, जिनको कंप्यूटर से एक केबल की मदद से जोड़ा जाता है
2.       वायरलेस माउस : ज्यादातर वायरलेस माउस कंप्यूटर के साथ जुड़ने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करते है. इनमे एक ट्रांसमीटर ( Transmitter ) और एक रेसिएवर ( Receiver ) लगा होता है. ट्रांसमीटर आपके हाथो के हावभाव को पहचान कर सिग्नल के द्वारा कंप्यूटर तक सिग्नल भेजता है, और रेसिएवर जो आपके कंप्यूटर से जुड़ा होता है उन सिग्नल को पकड़ता है. फिर उन्हें कंप्यूटर की लैंग्वेज में बदल कर आपके माउस ड्राईवर तक भेजता है. जिसके आधार पर कंप्यूटर डेस्कटॉप पर माउस काम करता है.
3.       ब्लूटूथ माउस : ब्लूटूथ माउस भी रेडियो फ्रीक्वेंसी पर काम करता है. ब्लूटूथ तकनीक से आप न सिर्फ माउस बल्कि प्रिंटर, हेडसेट, कीबोर्ड इत्यादि यंत्रो को भी कोम्प्टर से आसानी से जोड़ सकते हो. इसके लिए आपके कंप्यूटर में ब्लूटूथ अडाप्टर का होना बहुत जरुरी है. ताकि आपका कंप्यूटर में ब्लूटूथ चल सके और वो ब्लूटूथ के सिग्नल को पा सके. ब्लूटूथ माउस की रेंज लगभग 33 फूट ( 10 मीटर ) होती है. 
4.       RF माउस : इसके लिए आपको एक रिसीवर को USB की तरह अपने कंप्यूटर में लगाना होता है. ये सिर्फ आपके उस कंप्यूटर माउस के ही सिग्नल लेगा, जिसको आपने कंप्यूटर के साथ जोड़ा है. ये भी 33 फूट की दूरी तक काम करने की क्षमता रखते है. 
5.       बायोमेट्रिक माउस ( Biometric mouse) : बायोमेट्रिक माउस को सुरक्षा की दृष्टी को ध्यान में रख कर बनाया गया था. ये सिर्फ उस माउस को काम करने की अनुमति देता है जिसको आपके कंप्यूटर में मान्यता प्राप्त हो. इसमें आपके फिंगर प्रिंट को भी सिग्नल के द्वारा लिया जाता है ताकि आपका माउस आपके अलावा कोई और न इस्तेमाल कर सके. इसके इस्तेमाल के लिए आपको अपने कंप्यूटर में एक सॉफ्टवेर इनस्टॉल करना पड़ता है, जो आपको इस माउस को खरीदते वक़्त आपको मिलेगा. आप इस सॉफ्टवेर को इनस्टॉल करे, अपने फिंगरप्रिंट रजिस्टर करके स्टोर करे और फिर आप अपने माउस का आसानी से इस्तेमाल करे.
 

हार्ड डिस्क क्या होती है

हार्ड डिस्क एक तरह से कुछ डिस्को का समूह होता है, जो आपके डाटा को इलेक्ट्रोमग्नेटीकली तरीके से एक गोलाकार डिस्क में संभाल कर रखता है. इसका एक हिस्सा आपकी डाटा को लिखता और पढता है. हर पढ़े और लिखे हुए ऑपरेशन को एक रखने के लिए एक जगह की जरूरत होती है, जिसे “सीक” ( seek ) कहते है. हर हार्ड डिस्क ड्राइव यूनिट एक सेट रोटेशन गति के साथ ही आती है जोकि 4500 से 7200 rpm तक होती है. डिस्क के काम करने के समय को मिली सेकंड में नापा जाता है.
हार्ड डिस्क के प्रकार :

1.       IDE 

2.       SATA

3.       SCSI

4.       SAS

IDE ( Integrated Drive Electronics Drive ) :

इन्हें DE ( Drive Electronics ) और PATA ( Parallel Advance Technology Attachment Drive ) भी कहा जाता है. इनमे ज्यादातार 40 पिन पाई जाती है. ये हर सेकंड 133 MB की स्थानान्तरण रेट पर काम करता है. ये एक समय में 8 बिट डाटा को सेंड कर सकता है. PATA केबल का इस्तेमाल PATA हार्ड डिस्क को जोड़ने के लिए होता है. इससे दो ड्राइव एक साथ जोड़े जा सकते है. जिसमे से एक को मालिक और दुसरे को नौकर माना जाता है.
 
Explain Hard Disk Parts and its Types in Hindi
Explain Hard Disk Parts and its Types

SATA ( Serial Advance Technology Attachment Drive) :

इस ड्राइव में 7 पिन होती है, जिसमे से 4 पिन 2 जोड़े में काम करती है और फाइल को भेजने और पाने में मदद करती है. जबकि बची हुई 3 पिन नीचे ही रहती है. SATA ड्राइव हर सेकंड में 300 MB  तक के डाटा को ट्रान्सफर कर सकती है. ये डाटा को बिट के बाद बिट के तरीके से भेजती है. SATA केबल को SATA हार्ड डिस्क को जोड़ने में इस्तेमाल किया जाता है. इसमें केवल एक ही ड्राइव को जोड़ा जा सकता है.

SCSI ( Small Computer System Interface Drive ) :

इसमें ज्यादातर 50 से 68 पिन होती है और ये हर सेकंड 640 MB डाटा को भेज सकता है. SCSI केबल को SCSI हार्ड डिस्क को जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसके साथ ज्यादा से ज्यादा 16 ड्राइव जोड़े जा सकते है. 

SAS ( Serial Attached SCSI Drive ) :

इसमें ज्यादातर 805 MB डाटा को हर सेकंड भेजने की क्षमता होती है. इसकी केबल के साथ हम ज्यादा से ज्यादा 128 ड्राइव जोड़ सकते है.

बाहरी ( External ) हार्ड डिस्क और उसके लाभ :

आजकल हम सबके पास अपनी अपने कुछ डाटा, कुछ जानकारियां, या कुछ अन्य डॉक्यूमेंट होते है जिन्हें हम हमेशा अपने पास रखना चाहते है, लेकिन क्योकि आपकी वे डाटा आपके कंप्यूटर में होती है इसलिए आप उन्हें अपने साथ नही ले जा पाते, तब आप पैन ड्राइव का इस्तेमाल करते हो लेकिन पैन ड्राइव का इतना साइज़ ही नही होता जिसमे वो आपकी डाटा को स्टोर कर सके. तब आप बहुत परेशान होते हो. आपकी इसी परेशानी को बाहरी हार्ड डिस्क आसानी से दूर कर सकती है. ये कम से कम 320 GB तक का डाटा आसानी से स्टोर कर सकती है. जो आपके बैकअप के लिए बहुत होता है. इसके अलावा भी बहरी हार्ड डिस्क के कुछ लाभ होते है, आज हम उन्ही के बारे मे आपको बताते है.
 
Hard Disk ke part or prkar kya hai
Hard Disk ke part or prkar kya hai

बाहरी हार्ड डिस्क के लाभ

-    लेखागार ( Archiving ) :  कई बार कुछ ऐसा होता है कि हमारे पास अपने कंप्यूटर में अपने डाटा को रखने के लिए ज्यादा स्पेस नही होता या हम अपने एक कंप्यूटर से दुसरे कंप्यूटर में एक साथ ज्यादा डाटा भेज नही पते, उस स्थिति में हमे बाहरी हार्ड डिस्क की जरूरत होती है ताकि हम एक ही बार में काफी डाटा को उठा कर एक कंप्यूटर से दुसरे कंप्यूटर में डाल सकते.

-    बैकअप : कंप्यूटर एक ऐसी मशीन है जो हार्डवेयर और सॉफ्टवेर से मिल कर बनी है, तो एक मशीन होने कि वजह से हमारे मन में एक बात हमेशा रहती है कि इसके किसी पार्ट के ख़राब होने, या विंडो के उड़ जाने से या फिर किसी वायरस के आ जाने से आपकी सारी जरुरी डाटा, आपकी फाइल, पारिवारिक फोटो न चली जाये, इसलिया आप अपनी बाहरी हार्ड डिस्क को एक बैकअप के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हो.

-    सुरक्षा : जब आपकी डाटा का आप बैकअप कर लेते हो तो इससे आपकी डाटा को सुरक्षा मिलती है, क्योकि अब आपकी डाटा को कोई खतरा नही होता, आप इसे संभाल कर अपने पास रख सकते है और जरूरत पड़ने पर अपने कंप्यूटर से जोड़ कर अपने काम को पूरा कर सकते हो.

-    पोर्टेबिलिटी : बाहरी हार्ड डिस्क से आपको अपने डाटा को अपने साथ कही भी ले जाने की सुविधा भी मिल जाती है, जैसे हम अपने स्कूल बैग में एक साथ कई सारी किताबो को ले जा सकते है, उसी तरह आप अपनी हार्ड डिस्क में एक ही साथ अलग अलग और बहुत सारा डाटा ले जा सकते हो. 

-    कीमत : क्योकि कंप्यूटर के छेत्र में लगातार प्रतियोगिता चलती रहती है तो इस कारण से कंप्यूटर के हिस्सों की कीमत दिन प्रतिदिन गिरती जा रही है और इसी वजह से आपको अपनी बाहरी हार्ड डिस्क के लिए ज्यादा कीमत की जरूरत नही पड़ती. और ज्यादा कीमत के ना होने की वजह से ही बाहरी हार्ड डिस्क की मांग भी बहुत बड़ी है.

बाहरी हार्ड डिस्क का नुकसान

   कंप्यूटर के साथ जुड़ने वाली इस बाहरी हार्ड डिस्क के लाभ के साथ ही इसका एक नुकसान भी जुड़ा है. इसका छोटे और हल्का होना ही इसके नुकसान की वजह बना है क्योंकि इसे कोई भी आसानी से चुरा सकता है. इसलिए आपको इसको बहुत ही संभल कर रखने की जरूरत है.
 
हार्ड डिस्क क्या होती है

UNIQUE COMPUTER AND SPOKEN ENGLISH INSTITUTE

नवरात्रि  व दसहरा की शुभ कामनाएं
प्रिंटर कंप्यूटर के बाहरी हार्डवेयर का एक यंत्र होता है, जो कंप्यूटर से डाटा को लेता है और उस डाटा को पेपर पर छापता है. प्रिंटर आज हर क्षेत्र में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला यंत्र है, जिसका इस्तेमाल जरूरी कागजो की हार्ड कॉपी, फोटो इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है. प्रिंटर अलग अलग आकार, स्पीड, प्रिंट गुणवत्ता और कीमत के मिलते है. 
अगर आप अपने कंप्यूटर / लैपटॉप के लिए प्रिंटर लेना चाहते है तो उनमे इम्पैक्ट / नॉन इम्पैक्ट प्रिंटर के हिसाब से अंतर किया जा सकता है. क्योकि इम्पैक्ट प्रिंटर एक तरह से अपने आप चलने वाले टाइपराइटर की तरह काम करता है. इम्पैक्ट प्रिंटर का सबसे अच्छा उदहारण डॉट – मैट्रिक्स प्रिंटर है, ये सस्ता और सबसे अच्छा इम्पैक्ट प्रिंटर माना जाता है. नॉन इम्पैक्ट प्रिंटर में सबसे ज्यादा जाना जाने वाले प्रिंटर इंकजेट प्रिंटर है, जिनमे कम कीमत वाले रंगीन प्रिंटर आते है जैसेकि लेज़र प्रिंटर. लेज़र प्रिंटर एक लेसर बीम का इस्तेमाल करके प्रिंट करता है. 
 
Printers and The Types of Printer
Printers and The Types of Printer

प्रिंटर के गुण
प्रिंटर के 4 ऐसे गुण है इनकी वजह से सब इनकी तरफ आकर्षित होते है और इनका इतना ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. 
-    रंग – अगर आप अपनी किसी प्रेजेंटेशन से सम्बंधित जानकारियों को पेजो पर प्रिंट करवाना चाहते हो तो आपके लिए अपनी जानकारियों का सही कलर में होना जरुरी होता है. तो कलर प्रिंटर आपकी इस परेशानी को आसानी से दूर कर देता है. कलर प्रिंटर में 2 कार्ट्रिज इंक लगी होती है. एक ब्लैक इंक और दूसरी रंग इंक. 
-    प्रस्ताव ( Resolution ) पिंटर द्वारा प्रिंट किये गये पेपर के शब्दों का रंग और उनके सफाई से दिखने को ज्यादातर dot par inch में नापा जाता है और उसी से उसकी प्रस्तावना का पता चलता है. जितना ज्यादा प्रिंटर अच्छा resolution देता है उतनी ही साफ़ प्रिंट में सफाई आती है.
-    गति – प्रिंटर की प्रिंट करने की स्पीड भी अच्छी होनी चाहिए क्योकि जब आपको बहुत सारे पेपर को प्रिंट करना हो तो उन्हें समय पर प्रिंट करने के लिए प्रिंटर की अच्छी स्पीड का होना बहुत आवश्यक होता है.
-    मेमोरी ( Memory ) ज्यादाता प्रिंटर में बहुत कम मेमोरी आती है जिसको इस्तेमाल करने वाले बढ़वा सकते है. जितनी ज्यादा आपके प्रिंटर में मेमोरी होगी प्रिंटर भी उतनी ही ज्यादा गति से पेपर को प्रिंट करता है. 
 
Printer or Printers ke Prkar
Printer or Printers ke Prkar

प्रिंटर के प्रकार –
प्रिंटर कई प्रकार के होते है. उनको उनकी टेक्नोलॉजी, प्रिंट करने की क्षमता आदि को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित श्रेणियों में बात जा सकता है.
1.       डॉट मैट्रिक्स ( Dot Matrix ) प्रिंटर : डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर जो अक्षरों को छापता है और उन अक्षरों के बीच का अंतर भी कम रखता है. ये बहुत मांगे होते है, लेकिन ये एक साथ बहुत सारे पेपर को प्रिंट कर सकता है. इनके प्रिंट की गुणवत्ता उतनी अच्छी नही होती.
गति – प्रिंटर के काम करने की गति को cps ( Character per Second ) में नापा जाता है. डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर हर सेकंड में 50 से 500 अक्षर तक छाप सकता है. हर डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर की अलग गति होती है.
प्रिंट गुणवत्ता – इनकी गुणवत्ता इनकी पिन पर निर्धारित होती है. इनमे 9, 18, और 24 पिन पाई जाती है. सबसे अच्छे डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर में 24 पिन पाई जाती है. और इसीलिए इनकी प्रिंट गुणवत्ता भी बाकी के डॉट मैट्रिक्स पिंटर से बहुत अच्छी होती है.
इंक – डॉट मैट्रिक्स पिंटर अपनी इंक के लिए रिबन का इस्तेमाल करते है.
डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर काम करते वक़्त बहुत आवाज़ करते है. 
2.       इंक जेट ( Ink Jet ) प्रिंटर : एक ऐसा प्रिंटर है जो पेपर पर इंक छिड़क कर अपना काम करता है. इनमे कुछ चुम्बकीये प्लेट होती है जो इंक को उनकी सही जगह पर ही छिड़कती है. इंक जेट प्रिंटर के प्रिंट गुणवत्ता भी बहुत अच्छी होती है जो लगभग लेज़र प्रिंटर के प्रिंट के जैसी ही होती है. 
गति - एक लेज़र प्रिंटर हर सेकंड 600 अक्षर तक प्रिंट कर सकता है. हर इंक जेट प्रिंटर की काम करने की गति भी अलग अलग होती है.
प्रिंट गुणवत्ता – इनकी प्रिंट करने की गुणवत्ता को DPI ( Dot Per Inch ) में नापा जाता है और इनकी प्रिंट करने की गुणवत्ता हर इंच में 2440*1220 होती है. हर इंक जेट प्रिंटर की DPI अलग अलग होती है. 
इंक – इंक जेट प्रिंटर प्रिंट के इस्तेमाल के लिए कार्ट्रिज इंक का इस्तेमाल करते है.
इनकी कीमत लेज़र प्रिंटर से कम होती है लेकिन ये लेज़र प्रिंटर से कम गति पर काम करते है. इनमे एक कमी ये भी होती है कि इनमे सिर्फ एक खास तरह की ही इंक का इस्तेमाल किया जाता है.
3.       लेज़र ( Laser ) प्रिंटर : लेज़र प्रिंटर पेपर पर प्रिंट करने के लिए लेज़र बीम का इस्तेमाल करते है ताकि इमेज को ड्रम ( drum ) पर उतर सके. लेज़र प्रिंटर की रोशनी इलेक्ट्रिक चार्ज को बदल कर उन्हें ड्रम तक पहुंचती है. उसके बाद ड्रम रोल होकर टोनर से गुजरता है. टोनर ड्रम से इलेक्ट्रिक चार्ज को पकड़ता है. अंत में टोनर को गर्मी और दबाव के साथ एक पेपर तक भेजा जाता है और इस तरह लेज़र प्रिंटर पेपर पर प्रिंट निकलता है.
गति – लेज़र प्रिंटर की काम करने की गति को PPM ( Paper per Minute ) में नापा जाता है. ये हर मिनट में 31 से 40 पेज प्रिंट कर देता है.
प्रिंट गुणवत्ता – इनकी DPI लगभग 4880*2440 तक होती है. ये सबसे साफ़ प्रिंट देते है.
इंक – लेज़र प्रिंटर में प्रिंट इंक के रूप में टोनर कार्ट्रिज का इस्तेमाल किया जाता है.
कुछ अन्य प्रिंटर :
·         फोटो प्रिंटर : ये वो प्रिंटर है आपकी फोटोज को प्रिंट करता है. इनमे प्रिंट के लिए एक अलग पेपर का इस्तेमाल किया जाता है.
·         डाई सबलीमेंसन ( Sublimation ) प्रिंटर : इन प्रिंटर का इस्तेमाल गर्मी के माध्यम से प्लास्टिक कार्ड, प्रिंटर पेपर और शादी के कार्ड बनाना होता है.
·         आल इन वन प्रिंटर : इस प्रिंटर में आप प्रिंट, स्कैनिंग और फैक्स सभी चीज़े एक साथ कर सकते हो.
·         प्लॉटर ( Plotter ) : प्लॉटर का इस्तेमाल बड़े बड़े पोस्टर, बैनर और डाक्यूमेंट्स को प्रिंट करने के लिए किया जाता है.
·         3D प्रिंटर : ये वो प्रिंटर है जो 3D इमेज को प्रिंट करता है. 
वायरलेस प्रिंटर : इन प्रिंटर की मदद से आप बिना वायर से जुड़े, ब्लूटूथ वाई फाई के जरिये भी प्रिंट निकाल सकते हो.
 
प्रिंटर और उसके प्रकार
प्रिंटर और उसके प्रकार
this post by -lavlesh sir
आज हमे कंप्यूटर के प्रोसेसर को चुनने के लिए बहुत सारे आप्शन मिल जाते है लेकिन कुछ साफ़ पहले कंप्यूटर प्रोसेस को चुनने के लिए सोचना नही पड़ता था क्योकि उस वक़्त सिर्फ AMD  और Intel ही कंप्यूटर प्रोसेसर बनती थी और दोनों कंपनी सिर्फ एक ही सॉकेट का प्रोसेसर  बनती थी, जिनकी काम करने की गति भी सिमित होती थी. लेकिन आज के समय में कंप्यूटर प्रोसेसर को चुनने के लिए बहुत सोचना पड़ता है. इन दोनों कंपनीयो ने ही प्रोसेसर के इतने सारे प्रकार निकल दिए जो एक दुसरे से बहुत भिन्न होते है जैसेकि इनके सॉकेट अलग अलग होते है, इनकी क्लॉक गति भी अलग अलग होती है, यहाँ तक की इनके मॉडल नंबर तक एक दुसरे से अलग अलग होते है.

कंप्यूटर प्रोसेसर के कुछ प्रकार निम्नलिखित है :

-    बजट प्रोसेसर : इनका कीमत कम होती है. ये कम बिजली पर काम करते है और इसिलिए ये कंप्यूटर को अपग्रेड करने के लिए सबसे अच्छे माने जाते है.
 
कंप्यूटर प्रोसेसर के प्रकार
कंप्यूटर प्रोसेसर के प्रकार

-    AMD Sempron : AMD प्रोसेसर का ही एक मॉडल है, इसमें दो सॉकेट दिए जाते है. आपको इसके प्रोसेसर के हिसाब से ही अपने मदर बोर्ड को चुनना होता है. ये सुनिश्चित करना होता है कि आपका मदरबोर्ड इस प्रोसेसर के अनुरूप है या नही.

-    Intel Celeron :  शुरुआत में इस प्रोसेसर को बहुत बुरा माना जाता था क्योकि इसकी स्पीड कम और कीमत जाता थी लेकिन इसका इस्तेमाल लोग सिर्फ इंटेल के नाम की वजह से कटे थे. बाद में इस प्रोसेसर को अपग्रेड करके इसे Celeron D बना दिया गया. ये 64 बिट पर काम करते है.

-     Mainstream प्रोसेसर : ये बाकि प्रोसेसर से थोड़ी ज्यादा बिजली की खपत करता है, इसलिए इसे पुराने मदरबोर्ड के साथ नही जोड़ा जा सकता. इसके साथ साथ ये ज्यादा कोर ( core ) और ज्यादा हे काचेस ( caches ) को भी इस्तेमाल करता है तो इसका इस्तेमाल करते वक़्त अपने मदरबोर्ड को जरुर जाँच ले.
 
Types of Computer Processor
Types of Computer Processor

-    AMD Athlon 64 : इसमें भी दो सॉकेट होते है ओत ये भी 64 बिट सॉफ्टवेर को सपोर्ट करता है  लेकिन ये 32 बिट के बराबर ही काम करता है. ये DDR2 RAM को सपोर्ट करता है.

-    Intel Pentium 4 : इसकी बिट, गति और क्लॉक गति भी बाकि प्रोसेसर से ज्यादा होती है, इसमें 3.2 गीगा हर्ट्ज़ पर काम करने की छमता होती है.

-    Dual core processor : प्रोसेसर कंपनी द्वारा इसको प्रोसेसर की गति को बढ़ाने के लिए बनाया गया था और ऐसा करने के लिए उन्हें दो प्रोसेसर को एक साथ जोड़ना था और इसीलिए इन्हें ड्यूल कोर कहा जाता है. ऐसा करने से इनकी गति तो बड़ी ही साथ ही साथ इनका पर प्रदर्शन भी अच्छा हुआ और आज हर कंप्यूटर में कम से कम ड्यूल कोर प्रोसेसर तो मिलता ही है. 

-    AMD Athlon 64 X2 : इनको कंप्यूटर के प्रदर्शन को बेहतर करने के लिए बनाया गया था और इसको ऐसे बनाया गया कि ये कम से कम बिजली पर काम करके ज्यादा से ज्यादा कम कर सके और हर सॉकेट के साथ जुड़ सके. 

-    Intel Pentium D : इनमे आपको लगभग हर तरह की सुविधा मिल जाती है क्योकि ये कम बिजली में ज्यादा प्रदर्शन करते है, साथ ही ये ज्यादा गर्मी नही निकलते और ये हर मदरबोर्ड पर हर सॉकेट के साथ भी आराम से जुड़ जाते है. Intel  ने इनकी कीमत को भी ज्यादा नही रखा है. इसलिया ये हर किसी की पहुँच में भी है.

इन् सब प्रोसेसर के बाद भी इनके कई प्रकार भी मौजूद है, जो एक दुसरे से अलग होते है. आज हमे Dual Core के अलावा और भी ऐसे प्रोसेसर मिलते है जो एक से ज्यादा प्रोसेसर के मिलने की वजह से बने है जैसेकि Core 2 Do, Quad Core, Penta Core, Hexa Core, Octa Core इत्यादि, इसके अलावा हमारे पास ऐसे प्रोसेसर भी है जो IOS पर भी काम करते है जैसेकि i3, i4, i5 इत्यादि.

लेकिन जैसे जैसे इनमें ज्यादा से ज्यादा प्रोसेसर मिलते रहते है वैसे ही इनकी कीमत भी बढती जाती है. तो आप अपनी जरूरत और जेब को ध्यान में रखते हुए इनमे से किसी भी प्रोसेसर को अपने कंप्यूटर में इस्तेमाल कर सकते हो.
 

nexComputer Process ke Prkaar